सर्व शिक्षा अभियान के अतंर्गत प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षकों की समस्याओं का तुलनात्मक अध्ययन
डाॅ. कमल नारायण गजपाल1, नवीन कुमार द्विवेदी2
1विभागाध्यक्ष, प्रगति महाविद्यालय, रायपुर
2एम. एड. छात्र, प्रगति महाविद्यालय, रायपुर
*Corresponding Author E-mail: kngajpal@gmail.com
ABSTRACT:
मानव समाज के अभ्युदय से लेकर अब तक के विकास पर दृष्टिपात करे तो हम पायेगें कि व्यक्ति का जीवन इतना जटिल कभी नहीं रहा जितना कि आज है। जन्म के बाद व्यक्ति ज्यों-ज्यों समाज के संपर्क में आता गया है वह अपने को समस्याओं से घिरा पाता गया है। आज के भौतिक युग में जीवन संघर्ष प्राचीन काल की अपेक्षा बहुत अधिक बढ़ गया है। प्रत्येक व्यक्ति का अपना अस्त्तिव बनाए रखने के लिए एक महायुद्ध लड़ना पड़ रहा है।
KEYWORDS: सर्व शिक्षा अभियान
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प्राचीनता और नवीनता में यदि तुलना की जाए तो व्यक्ति के जीवन का हर पहलू बदला है। समाज बदला है, संस्कृति बदली है हर क्षेत्र में परिवर्तन दृष्टिगोचर हो रहें है। शिक्षा के क्षेत्र में भी अनेक परिवर्तन हुए है। प्राचीन भारत की गुरू शिष्य परंपरा द्वारा प्रदत्त शिक्षा शिक्षक केंद्रित थी, किंतु समय के चलायमान प्रगति के चक्र ने आधुनिक युग में शिक्षा को बाल केंन्द्रित बना दिया है ।
बालक इस प्रकृति की सबसे अनमोल कृति है वह अपने पास घटित होने वाली नवीनतम एवं अनोखी घटनाओं के प्रति सदैव उत्सुक व आकर्षित रहता है सौंदर्य से परिपूर्ण एवं कल्पनात्मक वह अपनी ही दुनिया में रहना चाहता है वह अपनी प्यारी सी, सुंदर, स्वंय दुनिया में पौधों व जीवों से बातें करता फिरता है, बादलों, तितलियों पक्षियों की भांति उड़ता फिरता है तथा प्रत्येक वस्तुओं को अपनी जादू भरी निगाहों से देखता रहता है। बालक नादान, नाजुक, संवेदनशील और कल्पनाशील होता है। वह एक पौधो की भांति होता है जिसे बहुत देख-रेख, उपयुक्त वातावरण तथा समुचित पोषण की आवश्यकता होती है और यदि उसका उचित पालन-पोषण किया जाए तभी उसके व्यक्त्तिव का विकास पूर्ण रूप से सींाव हो सकेगा।
एक बालक किसी भी राष्ट्र की रीढ़ है, आज का बालक कल का नागरिक है, आज का बालक ही भावी राष्ट्र का निर्माता है और वे किसी भी राष्ट्र की प्रथम प्रथमिकता होते है। अतः प्रथम प्राथमिकता वाले तथा राष्ट्र के भावी निर्माता को शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, सांवेगिक तथा आध्यत्मिक सभी दृष्टिकोण से परिपक्व केवल शिक्षा के माध्यम से ही बनाया जा सकता है।
जिस प्रकार एक ओर शिक्षा बालक का सर्वागीण विकास करके उसे तेजस्वी बुद्धिमान, चरित्रवान और वीर बनाती है, उसी प्रकर दूसरी ओर शिक्षा समाज की उन्नति के लिए भी एक महत्वपूर्ण एवं शक्तिशाली साधन है। शिक्षा के द्वारा समाज क भावी पीढ़ी के बालकों को उच्च आदर्शों, आशाओं, आकांक्षाओं, विश्वासों तथा परंपराओं आदि सांस्कृतिक संपत्ति को इस प्रकार से हस्तांरित करता है कि उनके हृदय में देश प्रेम तथा त्याग की भावना प्रज्वलित हो जाती है। इस प्रकार व्यक्ति तथा समाज दोनों के विकास कमें शिक्षा का विशेष महत्व है। शिक्षा के माध्यम से बालक या व्यक्ति स्वंय को ज्ञान और अनुभव का धनी बताता है। ज्ञान, अनुभव और समायोजन द्वारा वह अपने व्यवहार को परिवर्तित कर समय उपयोगी शुद्ध और कल्याणकारी बनाता है। अतः हम कह सकते है कि शिक्षा मानव चूतना का ज्योर्तिमय सांस्कृतिक पक्ष है जिससे व्यक्ति का बहुमुखी विकास होेता है।
आधुनिक युग में शिक्षा में शिक्षा का तात्पर्य उपदेश या सूचना देना नहीं है और न ही काल्पनिक सुदूर भविष्य को ध्यान में रखकर बालकों को शिक्षा देना हैं। आज शिक्षा का उद्देश्य बालक के जीवन की प्रत्येक अवस्था में उसके अभिवर्द्धन और विकास में सहायता करता है।‘‘सा विद्या या विमुक्तये’’- विद्या ही शिक्षा के पर्यायवाची शब्द के रूप में पहचानी जाती है। शिक्षा शब्द की उत्पति शिक्ष् धतु से हुई है। शिक्षा का संक्षिप्त, व्यापक, संकीर्ण, विस्तृत, सर्वव्यापक एवं सार्वभौम अर्थ में उस अनंत ज्ञान का प्रतीक है जिसके द्वारा व्यक्ति अंधकार रूपी बेडियों को तोड़कर निर्माण और मोक्ष रूपी विमान का स्वामी बन पाता है। शिक्षा एक प्रक्रिया है, जिसमें ब्रम्हण्ड में स्थित समस्त विषयों से संबंधित ज्ञान का समावेश है। शिक्षा के बिना मानव का जीवन पशु तुल्य हो जायेगा।
प्रस्तुत शोध कार्य वर्तमान परिवेश में प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षकों की स्थिति को ध्यान में रखकर किया गया हैं क्योंकि प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा ही बालक के विकास के लिये मूलाधार हैं। इन स्तरों पर शिक्षकों की वर्तमान में प्रथम प्राथमिकता शिक्षण न होकर विभिन्न गैर शिक्षकीय कार्य ही रह गए है और यही विभिन्न कार्यों के बोझ तले वह दबता जा रहा है और अपने प्रमुख कार्य अध्यापन कार्य से संतुष्ट नहीं हो पा रहे हैं।
सर्व शिक्षा अभियान:-
सर्व शिक्षा अभियान स्कूल प्रणाली को समुदाय आधारित करके प्रारंभिक शिक्षा को सर्वसुलभ बनाने का एक प्रयास है। संपूर्ण देश में बुनियादी शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार लाने की मांग सतत् रूप से उठती रही है। अतः सर्व शिक्षा अभियान एक ऐसा कार्यक्रम है जिसका लक्ष्य समुदाय मूलक उच्च कोटि की शिक्षा को एक मिशन के रूप में प्रावधान करके समाज के निर्बल से निर्बल तबके के बच्चों की मानवीय क्षमताओं में सुधार करने का एक अवसर प्रदान करना है। परंतु आज वर्तमान में सर्व-शिक्षा अभियान के अतंर्गत शिक्षकों को अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।
यह अभियान केन्द्र, राज्य सरकार और स्थानीय शासन की भागीदारी से संचालित है। इस अभियान के द्वारा प्रारंभिक शिक्षा की अपनी योजनाएँ तैयार करने के लिये राज्यों को अवसर प्रदान करता है।
सर्व शिक्षा अभियान के उद्देश्य:-
ऽ सर्व शिक्षा अभियान का उद्देश्य वर्ष 2010 तक 6 से 14 वर्ष की आयु के सभी बच्चों को उपयोगी एवं आवश्यक प्रारंभिक शिक्षा उपलब्ध कराने का है।
ऽ सर्व शिक्षा अभियान के अन्य लक्ष्य स्कूल प्रबंधन में समाज के सभी समुदायों को सक्रिय रूप से सम्मिलित करके सामाजिक भेद-भाव तथा स्त्री-पुरूष संबंधी अंतरों को दूर करना है।
ऽ उपयोगी और प्रारंभिक शिक्षा एक ऐसी शिक्षा प्रणाली की तलाश को महत्व प्रदान करती है, जो सामुदायिक एकता पर विशेष ध्यान देती है।
ऽ इसका उद्देश्य बच्चों को शिक्षण के बारे में अनुमति देना तथा उनकी मानवीय क्षमताओं अर्थात आध्यात्मिक और भौतिकवादी दोनों में सहज रूप से नैसर्गिक वातावरण में पूरी तरह से विकसित होने की अनुमति प्रदान करना है।
ऽ जिज्ञासा मूल्य परक शिक्षा प्रक्रिया का आधार भी होगी जो केवल निःस्वार्थ भाव से कार्य करने के बजाय प्रत्येक व्यक्ति के कल्याण के लिये कार्य करने के क्षेत्र में बच्चों को एक अवसर प्रदान करेगी।
सर्व शिक्षा अभियान के लक्ष्य:-
ऽ सभी बच्चों को वर्ष 2003 तक स्कूल, शिक्षा गारंटी केन्द्र वैकल्पिक स्कूल बैक टु स्कूल में दाखिला हो।
ऽ सभी बच्चे 2007 तक पांच वर्ष की प्राथमिक शिक्षा पूरी करें।
ऽ सभी बच्चे 2010 तक आठ वर्ष की प्राथमिक शिक्षा पूरी करें।
ऽ सभी बच्चे 2010 तक स्कूलों में अनिवार्य रूप से बनये रखना।
ऽ संतोष जनक स्तर की शिक्षा पर ध्यान केन्द्रित हो जिसमें जीवन के लिये शिक्षा पर विशेष बल हो।
ऽ स्त्री-पुरूष सभी अंतर तथा सामाजिक ऊँचे-नीचे के भोदभाव को वर्ष 2007 तक प्राथमिक स्तर तथा 2010 तक प्रारंभिक स्तर पर दूर करना।
शिक्षकों की समस्या -
जीवन में अनेको समस्याओं का सामना करना पड़ता है। जहाँ कुछ समस्याओं का हल ढूढने में हम सजग रहते है वहाँ कुछ समस्याओं के प्रति विशेष सजग नहीं रहते है। हम जो भी कार्य करते है उसमें हमें कठिनाइयाँ आती है। इन कठिनाईयों को दूर करने का सुनियोजित प्रयत्न किया जाय तो समस्या समाधान हो सकता है।शोध कार्य का आयोजन समस्या समाधान ज्ञात करने के लिए किया जाता है। शोध प्रक्रिया का प्रथम सोपान समस्या को पहिचानना होता है। समस्या का चयन सृजनात्मक चिंतन से किया जाता है। मानव जीवन में जब तक प्रभाव शाली सृजनात्मक चिंतन का प्रयोग नहीं हुआ तब तक आदिम वासियों के समान रहे परंतु जब से बुद्धिमान व्यक्तियों ने प्राचीन समस्याओं के नवीन समाधान दिये तब से मानव विकास जारी हुआ।
माध्यमिक शिक्षा आयोग -
शिक्षा के क्षेत्र में शिक्षक का कार्य निष्पादन सर्वाधिक महत्व का निवेश है। शिक्षा से संबंधित प्रत्येक योजना का सफल क्रियान्वयन शिक्षकों के वैयक्तिक व्यवहार, शिक्षण-अधिगम प्रक्रियाओं व कार्य निष्ठा पर निर्भर करता है। अपने शिष्यों के कल्याण के लिए पूर्णतः प्रतिबद्ध, परिश्रमी व सृजनशील शिक्षकों ने शिक्षा प्रणाली में व्याप्त असंतोष व नगण्य लाभों के बावजूद अपने व्यावसायिक दायित्वों को समर्पण भाव से निभाया है।
मानव अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये अनेकों साधनों को अपनाया है। यदि आवश्यकता की संतुष्टि किसी उपलब्ध साधन द्वारा नहीं हो पाती है तब एक समस्या उत्पन्न हो जाती है। सर्व शिक्षा अभियान के अतंर्गत बालकों के सर्वागीण विकास एवं 6 से 14 वर्ष के बालकों को प्राथमिक शिक्षा अनिवार्य रूप से प्रदान करने हेतु एक प्रयास है परंतु इसके अतंर्गत शिक्षकों के समक्ष अनेक समस्यायें उत्पनन हो गयी। सर्व शिक्षा अभियान के अतंर्गत अनेक सामुदायिक कार्य करने पड़ते है जिससे शिक्षकों के समक्ष अनेक समस्याएँ उत्पन्न होने लगी है।शिक्षकों को अध्यापन के अतिरिक्त अन्य कार्य करने पड़ते है जो शिक्षकों के समक्ष समस्या उत्पन्न करते है।शिक्षकों को मत पत्र तैयार करना,मतदान कार्य हेतु फोटोग्राफी कार्य,निर्वाचन संबंधी कार्य,जनगणना एवं पशु गणना संबंधी कार्य,स्वास्थ्य संबंधी कार्य ,शिक्षकों की पर्याप्त संख्या न होना,विद्यालयों में पर्याप्त संसाधनों का अभाव,कार्य का अत्यधिक भार,शिक्षकों को योग्यता के अनुरूप स्तर प्राप्त न होना।इस प्रकार सर्व शिक्षा अभियान के अंतर्गत शिक्षकों के समक्ष अनेक समस्यायें है।
प्राथमिक शिक्षकों की समस्याएँ -
प्राथमिक विद्यालय में शिक्षकों को पूर्ण रूप से सुविधाएँ प्राप्त नहीं होने से अनेक समस्यायें होती है। विद्यालय में शिक्षण सामग्री उपलब्ध नहीं होता है। शिक्षकों का वेतन कम होता है जिससे वे शिक्षण कार्य में रूचि नहीं लेते। प्रशिक्षण की व्यवस्था नहीं होती है। शिक्षकों की कमी होने से कार्य का भार बढ़ जाता है। सर्व-शिक्षा अभियान के अंतर्गत अनेक योजनाएँ एवं कार्यक्रम लागु किया जा रहा है। परंतु शिक्षकों की कमी एवं शिक्षकों की स्थिति दशा के बारे में उचित ध्यान दिया जा रहा है।
माध्यमिक शिक्षकों की समस्याएँ -
माध्यमिक विद्यालय में शिक्षकों के समक्ष अनेक समस्यायें है। सर्वेक्षण कार्य करने पड़ते है, जिसके कारण शिक्षकों के सम्मान में कमी आती है। मानसिक परेशानी होती है तथा पाठ्यक्रम पूरा नहीं होता परीक्षा परिणाम प्रभावित होता है। शिक्षकों पर कार्य का भार रहता है। पालकों का सहयोग नहीं मिलता। वे अपने बच्चों को विशेषकर लड़कियों को स्कूल नहीं भेजते है। इस प्रकार शिक्षकों के समक्ष अनेक समस्यायें है।
अध्ययन का महत्व:-
समस्या किसी भी समाज के लिये एक भयंकर रूप है। समस्या के कारण सभी की स्थिति अत्यंत दायनीय हो जाती है। बालकों के सर्वागीण विकास के लिये शिक्षक भरसक प्रयास करते है। सर्व शिक्षा अभियान के अतंर्गत 6-14 वर्ष के बालकों को अनिवार्य एवं निःशुल्क प्राथमिक एवं प्रारंभिक शिक्षा प्रदान करने के लिये विशेष सुविधा प्रदान किया जा रहा है परंतु शिक्षकों की स्थिति एवं दशाओं के बारे ध्यान नहीं दिया जा रहा इसलिये आज वर्तमान में शिक्षकों के समक्ष अनेक समस्यायें उत्पन्न हो रही है। उपरोक्त कारणों से शोधकर्ता ने ‘‘सर्व शिक्षा अभियान के अतंर्गत प्राथमिक एवं मध्यमिक शिक्षकों के समस्याओं का तुलनात्मक अध्ययन’’ विषय पर अध्ययन प्रस्तुत करने का प्रयास किया है।
इस वैज्ञानिक युग में शिक्षकों के सामने वर्तमान परिस्थितियों में विभिन्न प्रकार की समस्याएं दिखाई देती हैं। अतः यह अतिआवश्यक है कि उन सभी समस्याओं को दूर कर समाज में उसका ठीक से समायोजन स्थापित हो। इसके लिये आवश्यक है कि शिक्षक अपने व्यवसाय में पूर्ण संतुष्टि पा रहा है। अनुसंधान शिक्षकों की मूल रूप से ज्ञान वृद्धि के साधन होते हैं जिसका मुख्य उद्देश्य समस्या का समाधान करना हैं, जिससे नए नियम, सिद्धांत तक विधियों का ज्ञान होता हैं तथा संबंधित पूर्व स्थापित सिद्धांतों का सत्यापन किया जाता है।
इस प्रकार का अध्ययन केवल निदानात्मक एवं सुधार तक सीमित नहीं है वरन यह लाभदायक भी हो सकता हैं क्योंकि इसके अध्ययन द्वारा आंकड़ों से शिक्षकों की समस्याओं के मापन में सहायक सिद्ध होगें। प्रस्तुत शोध कार्य वर्तमान परिवेश में प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षकों की स्थिति को ध्यान में रखकर किया गया हैं क्योंकि प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा ही बालक के विकास के लिये मूलाधार हैं।
संबंधित शोध साहित्य का अध्ययन:-
विभिन्न शोधकर्ताओं द्वारा जो अध्ययन किया गया हैं, उन ज्ञानकोषों की संक्षिप्त जानकारी देने का प्रयास किया गया हैं, जो अग्रांकित हैं -
भारत में किए गए शोध अध्ययन:-
मिश्रा (1990) -
इन्होंने माध्यमिक स्तर पर हिन्दी, अंग्रजी तथा संस्कृत भाषा के शिक्षकों की समस्याओं का अध्ययन किया। इनके निम्नलिखित निष्कर्ष थे -10 प्रतिशत शिक्षक काव्य पदों के शिक्षण की कठिनाईयों से अनुभवी थे।सिर्फ 32 प्रतिशत शिक्षक छात्रों को सामान्य रूप से पढ़ने के लिये उत्साहित करते है।10 प्रतिशत शिक्षकों ने यह माना कि पाठ्य पुस्तको के अध्ययन छात्रों के मानसिक स्तर से ऊँचे थे।केवल 25 प्रतिशत शिक्षक ही छात्रों को गृहकार्य देते थे एवं जाँचते एवं सुधारते थे।
राव (1990) -
विकलांग बालकों की समस्याओं पर एक अध्ययन किया, जिसमें निम्नलिखित निष्कर्ष प्राप्त हुये -शारीरिक रूप से विकलांग बच्चों की समस्याएँ विभिन्न प्रकार की पाई गई।विकलांग बालकों को लिखने, चित्र बनाना, पृष्ठ उलटने प्रयोग शाला उपकरणों के उपयोग आदि में कठिनाई उत्पन्न हुई।
वर्मा (1999) -
बाल श्रमिक कल्याण केन्दों में शिक्षकों की समस्याओं का अध्ययन कर निम्न निष्कर्ष निकाला -विस्थापित बाल श्रमिक कल्याण केन्दों में सेवारत अध्यापक एवं अध्यापिकाओं के मासिक मानदेय में वृद्धि की जानी चाहिए।सरकार को ऐसे नियम पारित करना चाहिए जिससे कि इस तरह के अध्यापक एवं अध्यापिकाओं को मानदेय के अतिरिक्त भविष्य निधि पेंशन एवं आवासीय सुविधाएँ प्रदान की जायें।ऐसे निरीक्षकों की नियुक्ति की जानी चाहिए जो विस्थापित बाल श्रमिक कल्याण केन्दों में समय-समय पर यह देख सकें कि अध्यापक एवं अध्यापिकाओं के मानदेय में कोई गड़बड़ी अनावश्यक रूप से तो नहीं हो रहा है।इन केन्दों में सेवारत् अध्यापक एवं अध्यापिकाओं के अध्यापन के 36 घंटे सप्ताहिक रूप से कम कर दिये जाने चाहिए, क्योंकि इन केन्द्रों में अध्यापक एवं अध्यापिकाओं को अधिक कार्य करना पड़स्ता है।
दैनिक भास्कर (18 दिसंबर 2005) - के संवाददाता के शासन द्वारा संचालित सर्व शिक्षा अभियान के अतंर्गत शिक्षा के स्तर के संबंधित यह जानकारी प्रदान की -सर्वशिक्षा अभियान द्वारा शिक्षा के स्तर में सुधार नहीं हो पाया है। बच्चों के मानसिक स्तर में विकास की आवश्यकता है। प्रशिक्षण के लिये करोड़ रूपये खर्च किये जा रहे है, परंतु प्रशिक्षण का उपयोग कक्षा में नहीं हो पा रहा है। बच्चों को प्रायोगिक तौर पर समझाने के लिये सहायक सामग्री हेतु राशि स्वीकृत किया गया है परंतु शिक्षण सामग्री का प्रयोग कक्षा में नहीं के बराबर होता है। और स्वीकृत राशि का सही उपयोग भी नहीं हो पा रहा है। शिक्षकों की समस्याओं पर किसी प्रकार की चर्चा नहीं की जाती है। कि इन समस्याओं का समाधान क्या है।
दैनिक भास्कर (18 दिसंबर 2005) - के संवाददाता के सर्वेक्षण द्वारा यह जानकारी प्राप्त हुई है कि - सर्वेक्षण अभियान द्वारा संचालित विद्यालयों में शिक्षकों की कमी है। नये शिक्षकों की नियुक्ति की आवश्यकता है। यदि शिक्षक प्रशिक्षण में चले जाते है तो स्कूल को बंद करना पड़ता है। एक शिक्षक होने के कारण स्कूल को बंद करना पड़ता है। प्रशिक्षण के दौरान शिक्षक की जिम्मेदारी छात्र सींाालते है। कभी-कभी दो कक्षाओं को एक साथ बैठाना पड़ता है।
दैनिक भास्कर (18 दिसंबर 2005) - के संवाददाता द्वारा सर्वशिक्षा अभियान से संबंधित प्रकाशित लेख द्वारा यह जानकारी प्राप्त हुई -सर्व शिक्षा अभियान के लिये मिली रकम का सही उपयोग नहीं हो पा रहा है। सहायक शिक्षण सामग्री हेतु स्वीकृत राशि का का उपयोग नहीं हो पा रहा है। विद्यालय में प्रायोगिक कार्य नहीं होता है। बने उपकरणों का भी उपयोग नहीं होता जिससे वह रखे-रखे ही खराब होने लगा हैं विद्यालय में उपकरण रख-रखाव हेतु कोई व्यवस्था नहीं है।अध्ययन के लिये किसी उद्देश्य की असवश्ययकता होती हैं और व्यक्ति अपेन उद्देश्यय के परिणामस्वरूप जो कुछ सीखता हैं वह अधिकांशतः इस बात पर निर्भर होता है कि व्यक्ति को उद्देश्य प्राप्त करने में कितनी सफलता मिलती हैं। अतएव यह आवश्यक है कि कार्य की शुरूवात से पहले उद्देश्यों का निर्माण किया जाए।
किसी भी अध्ययन का उद्देश्य इस प्रकार निर्धारित किया जाता है कि वह भविष्य में आने वाली समस्याओं के समाधान में सहायक तथा समाज के लिये उपयोगी सिद्ध हो सके। इस अध्याय में शोधकर्ता द्वारा यह समझाने का प्रयत्न किया गया है कि चयनित अध्ययन का प्रयोग किन-किन क्षेत्रों में किया जा सकता हैं अन्य क्षेत्रों में यह अध्ययन सार्थक है अथवा नहीं है समस्या के कारण क्या है तथा इसका अध्ययन किन उद्देश्यों को ध्यान में रखकर किया जा रहा है समस्या के समाधान हेतु इसकी समिाएँ किस तरह निर्धारित की गई है आदि तथ्यों पर प्रकाश डाला गया हैं। जब कभी शिक्षा के विषय पर विचार किया जा ता है तो शिक्षा का मूल्याकंन केवल उसके भौतिक पक्ष के अवलोकन मात्र से नहीं किया जाता है और न ही सींाव है कि केवल आध्यात्मिक पक्ष के आधार मान लिया जाए बल्कि यह शिक्षा मनुष्य के बौद्धिक विकास के साथ-साथ संवेगात्मक अभिव्यिक्ति भी सबसे महत्वपूर्ण कारक होती है।
समस्या का कथन:-
प्रस्तुत अध्ययन हेतु शोधकर्ता ने इस समस्या का चयन किया है - ‘‘सर्व शिक्षा अभियान के अतंर्गत प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षकों की समस्याओं का तुलनात्मक अध्ययन ’’।
अध्ययन का उद्देश्य:-
इसके अंतर्गत शोधकर्ता द्वारा ली गई समस्या हेतु निम्न लिखित उद्देष्यों का निर्माण किया है -
ऽ सर्व शिक्षा अभियान के अंतर्गत प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षकों की समस्याओं का अध्ययन करना।
ऽ सर्व शिक्षा अभियान के अंतर्गत प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षकों की शिक्षक संबंधी समस्याओं का अध्ययन करना।
ऽ सर्व शिक्षा अभियान के अंतर्गत प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षकों की शिक्षण संबंधी समस्याओं का अध्ययन करना।
ऽ सर्व शिक्षा अभियान के अंतर्गत प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षकों की प्रशिक्षण संबंधी समस्याओं का अध्ययन करना।
ऽ सर्व शिक्षा अभियान के अंतर्गत प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षकों की व्यवस्था संबंधी समस्याओं का अध्ययन करना।
अध्ययन की परिकल्पना:-
प्रस्तुत समस्या के अध्ययन हेतु शोधकत्र्ता ने निम्न लिखित परिकल्पनाओं का निर्माण किया है -
ऽ परिकल्पना भ्1 - सर्व शिक्षा अभियान के अंतर्गत प्राथमिक एवं माध्यमिक शाला की शिक्षकों की समस्याओं में अंतर पाया जायेगा।
ऽ परिकल्पना भ्2 - सर्व शिक्षा अभियान के अंतर्गत प्राथमिक एवं माध्यमिक शालाओं की शिक्षक की शिक्षक संबंधी समस्या में सार्थक अंतर नहीं पाया जायेगा।
ऽ परिकल्पना भ्3 - सर्व शिक्षा अभियान के अंतर्गत प्राथमिक एवं माध्यमिक शाला की शिक्षकों की शिक्षण संबंधी समस्या में सार्थक अंतर नहीं पाया जायेगा।
ऽ परिकल्पना भ्4 - सर्व शिक्षा अभियान के अंतर्गत प्राथमिक एवं माध्यमिक शाला की प्रशिक्षण संबंधी समस्या में सार्थक अंतर नहीं पाया जायेगा।
ऽ परिकल्पना भ्5 - सर्व शिक्षा अभियान के अंतर्गत प्राथमिक एवं माध्यमिक शाला के शिक्षकों की व्यवस्था संबंधी समस्या में सार्थक अंतर पाया जायेगा।
अध्ययन की परिसीमा:-
प्रस्तुत लघु शोध समस्या के अध्ययन के लिए शोधकर्ता ने निम्नलिखित परिसीमाओं का निर्माण किया है -
ऽ प्रस्तुत अध्ययन हेतु रायपुर जिले का चयन किया गया है।प्रस्तुत अध्ययन हेतु रायपुर जिले के अंतर्गत रायपुंर शहर का चयन किया गया है।
ऽ प्रस्तुत अध्ययन हेतु रायपुर के शहरी क्षेत्र के 10 शासकीय विद्यालयों का चयन किया गया है।प्रस्तुत अध्ययन हेतु सर्व शिक्षा अभियान द्वारा संचालित प्राथमिक एवं माध्यमिक शालाओं के शिक्षकों का चयन किया गया है।
ऽ प्रस्तुत अध्ययन हेतु 50 प्राथमिक शाला के शिक्षकों तथा 50 माध्यमिक शाला के शिक्षकों का चयन किया गया है।कुल 100 शिक्षकों की स्थिति के संबंध में जानकारी प्राप्त की जायेगी।प्रस्तुत अध्ययन हेतु शिक्षकों के अंतर्गत नियमित शिक्षकों, शिक्षा कर्मियों एवं संविदा नियुक्ति प्राप्त शिक्षकों को लिया गया है।
ऽ प्रस्तुत अध्ययन के लिये शोध की सर्वे विधि का प्रयोग किया गया है। प्रस्तुत अध्ययन हेतु स्वनिर्मित साक्षात्कार अनुसूची का प्रयोग किया गया है।
षोध प्रविधि:-
प्रस्तुत लघुशोध प्रबंध की समस्या के अध्ययन के लिए शोधकर्ता द्वारा सर्वेक्षण विधि का प्रयोग किया गया है ।
1. जनसंख्या:-
प्रस्तुत अध्ययन में शोध द्वारा ‘सर्व शिक्षा अभियान के अतंर्गत प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षकों की समस्याओं का तुलनात्मक अध्ययन’ किया गया है और इस अध्ययन के लिये जनसंख्या के लिये रायपुर शहर में स्थित 10 शासकीय प्राथमिक एवं 10 माध्यमिक विद्यालयों का चयन किया गया है तथा इन विद्यालयों में कार्यरत् शिक्षकों की समस्याओं का अध्ययन किया जा रहा है। जिसमें जनसंख्या के लिए शासकीय विद्यालयों के अध्यापनरत् कुल 397 शिक्षकों को शामिल किया गया है।
2. न्यादर्श:-
शोध अध्ययन हेतु रायपुर शहर में स्थित 10 शासकीय प्राथमिक एवं 10 शासकीय माध्यमिक विद्यालयों के अध्यापनरत् शिक्षकों का चयन यादृच्छिक प्रतिदर्ष विधि से किया गया है। जिसके अन्तर्गत समस्या के समाधान हेतु जिसमें जनसंख्या के लिए शासकीय विद्यालयों के अध्यापनरत् कुल 100 शिक्षकों का न्यादर्ष हेतु चयन किया है। इनमें से प्राप्त परिणाम समग्र का पूर्णतः प्रतिनिधित्व करेगंे। जिसमें शासकीय प्राथमिक एवं माध्यमिक विद्यालयों के कुल 100 शिक्षकों का चयन किया गया है और जिनमें 50 प्राथमिक तथा 50 माध्यमिक शाला के शिक्षक सम्मिलित है।
उपकरण:-
संबंधित समस्या ‘‘सर्व शिक्षा अभियान के अतंर्गत प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षकों की समस्याओं का तुलनात्मक अध्ययन’’ का क्रमानुसार तथा प्रत्येक बिन्दु पर अध्ययन के लिये शोधकर्ता द्वारा एक स्वयं निर्मित प्रश्नावली का निर्माण किया गया है।
सांख्यिकीय अभिप्रयोग:-
प्रदत्त हेतु सांख्यिकीय का उायोग करना आवश्यक हो जाता है। परीक्षण उपारांत सभी का प्राप्तांक प्राप्त किया गया। आंकडें के विश्लेषण के लिये वर्गानुसार प्राप्तांकों का मध्यमान, प्रमाणिक विचलन, प्रमाणिक विचलन पुल्ड, प्रमाणिक त्रुटि एवं ‘टी मूल्य’ निकाला गया।
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1 परिकल्पना एच1 -
सर्व शिक्षा अभियान के अंतर्गत प्राथमिक एवं माध्यमिक शाला की शिक्षकों की समस्याओं में अंतर पाया जायेगा।’’
|
df = 98 |
P>0.01 |
t = 1-28 |
lkFkZd varj ugha gSA
निष्कर्ष
अतः यह परिकल्पना अस्वीकृत होती है।
2. परिकल्पना एच2 -
‘‘सर्व शिक्षा अभियान के अंतर्गत प्राथमिक एवं माध्यमिक शालाओं की शिक्षक की शिक्षक संबंधी समस्या में सार्थक अंतर नहीं पाया जायेगा।’’
|
df = 98 |
P>0.01 |
t = -91 |
lkFkZd varj ugha gSA
निष्कर्ष:-
यह परिकल्पना स्वीकृत होती है।
3. परिकल्पना एच3 - ‘‘सर्व शिक्षा अभियान के अंतर्गत प्राथमिक एवं माध्यमिक शाला की शिक्षकों की शिक्षण संबंधी समस्या में सार्थक अंतर नहीं पाया जायेगा।’’
|
df = 98 |
P>0.01 |
t = 2-40 |
lkFkZd varj ugha gSA
निष्कर्ष:- यह परिकल्पना अस्वीकृत होती है।
4 परिकल्पना एच4 -
सर्व शिक्षा अभियान के अंतर्गत प्राथमिक एवं माध्यमिक शाला की प्रशिक्षण संबंधी समस्या में सार्थक अंतर नहीं पाया जायेगा।’’
|
df = 98 |
P>0.01 |
t = 1-55 |
lkFkZd varj ugha gSA
निष्कर्ष:- अतः यह परिकल्पना स्वीकृत होती है।
5.परिकल्पना एच5 - ‘सर्व शिक्षा अभियान के अंतर्गत प्राथमिक एवं माध्यमिक शाला के शिक्षकों की व्यवस्था संबंधी समस्या में सार्थक अंतर पाया जायेगा।’’
|
df = 98 |
P>0.01 |
t = 1-68 |
lkFkZd varj ugha gSA
निष्कर्ष:-
अतः यह परिकल्पना अस्वीकृत होती है।
संदर्भित ग्रंथ सूची:-
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17. यादव सरोज (2001), ‘‘प्राइमरी शिक्षक’’ पृष्ठ संख्या - 12।
Received on 19.12.2020 Modified on 23.12.2020
Accepted on 26.12.2020 © A&V Publication all right reserved
Int. J. Ad. Social Sciences. 2020; 8(4):121-128.